Tuesday, 9 August 2016

कविता

ज़िन्दगानी
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ज़रा,बैठो,मुस्कुराओ,बात करो
कल जो चाहते हो,आज करो

पवन के महल हों या सच के
क्यों जरुरी रहना,सदा सज के
क्यों भाग रहे हो कल के लिये
ढूंढ़ लो कुछ वक्त आज के लिये

इतना जो खुश रहते हो
कौन सा ग़म सहते हो
यही ख़ुशी अपनों से बांट लो
उनके हिस्से की भी आंच लो

झोपड़ी भी महल ना लगे तो  कहना
हर बात में जिंदगानी ना हो तो कहना
नहीं बदलते माता-पिता,बहन-भाई
तो कैसे बदलो तुम,कैसे बदले कोई

महल में रह,सज लो ज़रा ख़ुद के लिए।
कभी पढ़-गढ़ लो 'हमारे' वजूद के लिए
ज़िन्दगी कभी सुबह कभी शाम है
कभी कोल्हू का बैल,कभी आराम है

ज़रा,बैठो,मुस्कुराओ,बात करो
कल जो चाहते हो,आज करो।

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